الثلاثاء، 27 مايو 2014

فريسيون وباعه حمام !!.. (معدل)

فريسيون وباعه حمام !!.. (معدل)

26 May 2014 at 07:31
فريسيين  وباعه  حمام  ..

مقدمة  :
مع  انطلاق  موضة  استخدام  الكتاب  المقدس  في  الهجوم  والتي  سنتطرق  إلي  شرح  سماتها  لاحقا  حاول  احدهم  من  منطلق  "كراهيته"  لرابطة  حماة  الإيمان  التي  تتنافى  مع  وصايا  السيد  المسيح  أيضا  التي  يعظوننا  بها  وعجزه  عن  الرد  على  ما  ينشر  في  ماده  علميه  لم  يستطع  إلا  أن  يحول  الأمور  إلي  شخصنه  وأن  يحاول  فقط  مجرد  محاوله  ان  يشوه  صورة  الرابطة  .

وفي  المنطلق  الذي  بدأ  به  هو  وقع  في  مغالطة  منطقية  شهيرة  جدا  تسمى  (الشخصنة)  أو  (القدح  الشخصي)  .
وقبل  أن  نبدأ  الرد  نتناول  معا  مفهوم  جدا  الا  وهو  المغالطات  المنطقية
يقال  عنها    :  حتى  ولو  كانت  كل  المعطيات  صحيحة  فمن  الممكن  للحجة  أن  تكون  غير  سليمة  إذا  كان  المنطق  المستخدم  غير  سليم،  تسمى  هذه  الحالة  بالمغالطات  المنطقية.  فالعقل  البشري  لم  يتكيف  مع  استخدام  المنطق  بكل  دقة،  فهناك  أفخاخاَُ  منطقية  تنجذب  عقولنا  إليها،  فيجب  أن  نكون  واعين  بها  ونحاول  أن  نتفاداها.

والمغالطات  المنطقية  كما  يصفها  أفلاطون  ضمنيا  هي  محاوله  أن  يقنع  السامعين  حتى  ولو  لجأ  إلي  المغالطات  .  ,  قال  أفلاطون    :  "  وهكذا  فإن  جاهلا  يتحدث  أمام  جهله  هو  الذي  يتغلب  على  العالم  ,  عندما  ينتصر  الخطيب  على  الطبيب"
وقام  صاحبنا  في  مقالاته  باستخدام  ما  وصفه  علماء  المنطق  بأدنى  مغالطه  منطقيه  تتنافى  مع  الأخلاق  إلا  وهي  الشخصنه.
الشخصنة  أو  القدح  الشخصي    صنف  شائع  من  المغالطات،  بحيث  أن  "الدعوى"  أو  "الحجة"  تكون  خاطئة،  بسبب  معلومات  (عيوب)  متعلقة  بالكاتب  أو  بالشخص  الذي  يعرض  هذه  الدعوى،  وليس  بالدعوى  نفسها.  في  العادة  تتخذ  هذه  المغالطة  خطوتان:  الأولى،  هي  هجوم  على  الشخص  الذي  يتبنى  الدعوى  بسبب  ظروفه  أو  أفعاله  أو  أي  شيء  متعلق  بشخصيته.  الثانية،  يتم  تمديد  الهجوم  ليكون  دليلا  ضد  الدعوى  أو  الحجة.
وهكذا  عانى  صديقنا  المُهاجم  لنا  كثيرا  وهو  يحيك  لنا  تلك  المغالطة  باستماتة  وكنا  نتمنى  أبسط  أنواع  الصدق  حتى  نصل  إلى  حوار  أكاديمي  راقي  يستفيد  منه  الجميع  .

1-  أخطاء  علميه:
أراد  صديقنا  ان  يبحث  لنا  عن  (مسبه)  من  الكتاب  المقدس  أو  صفه  يضعها  في  مقدمه  مقاله  كي  ما  يجاهد  في  اثباتها  بخلاف  الحقيقة  .  وبعد  ان  أعياه  البحث  تفضل  مشكورا  بكل  محبه  ووصفنا  بأننا  "فريسيين"  و  "  باعه  حمام"
ولنقرا  معا  سطورا  قليله  من  تعريفة  للفريسي  فيقول  :
"  الفريسي.  رجل  المعلومات  الأول.  وأخر من  يسلك  بها  ...."
"  الفريسي  يستمد  قيمته  ليست  من  مكانه  في  المسيح،  لكنها  من  مكانه  في  المتكأ  الأول  الذي  يعشقه  ويبيع  نفسه  لأجله....."
"  الفريسي  حين  وجد  المسيح  يوحد  الشعب  ويتبعه  أصابه  الذعر  ..."
"  الفريسي  شخص  يدعي  حماية  الإيمان  والتراث،  ويرسم  صورة  التقوى  ومعرفة  الله  الحقه"
"  الفريسي  هو  النوع  الوحيد  الذي  كنا  نري  أمامه  الجانب  الآخر  لمحبة  يسوع  المسيح،  الصرامة  وعدم  التهاون،  فقد  اعتدنا  أن  نري  يسوع  المسيح  المشفق  على  الخطاة  المعترفين  بخطاياهم،  لكنه  مع  الفريسيين  يكون  صارم  جدًا"
هكذا  قدم  صديقنا  صفات  الفريسي  ..  ولا  اعتراض  لنا    أن  يكون  ما  فات  هي  صفات  ناتجة  عن  تأمل  روحي  لسلبيات  يجب  الا  نتجاهلها  في  حياتنا  بل  ونقاومها  ونحاربها  ..  أما  صديقنا  فقد  قدم  ما  فات  ليلفق  لنا  تهمه  الفريسي  !!!

وقد  ذكر  صديقنا  نقطة  تأملتها  طويلا  عندما  قال  :
"  فلنذكر  جيدًا  أن  الفريسي  بائع  حمام  ماهر  ...  "

وكما  ذكرت  سابقا  أن  المحاولات  المستميته  لصديقنا  لاتهامنا  جعلته  يشكل  حتى  الصفات  على  هواه  في  مقدمات  –  وهي  أيضا  مغالطة  منطقيه  شهيرة    -  فأسقطته  في  كثير  من  الأخطاء  ..
ودعونا  نرى  تعريف  الفريسي  ونتعرف  عليه  أكثر  حتى  إذا  ما كان  في  قلوبنا  فريسيا  نقتله  فورا  .  ونساعد  من  في  قلبه  ذاك  الفريسي  ان  يتخلص  منه.

الكلمة  من  الآرامية    ومعناها  "المنعزل"  وهو  إحدى  فئات  اليهود  الرئيسية  الثلاث  التي  كانت  تناهض  الفئتين  الأخريين  فئتي  الصدوقين  والأسينيين،  وكانت  أضيقها  رأيًا  وتعليمًا  (أع  26:  5).  ويرجّح  أن  يكون  الفريسيون  خلفاء  الحسيديين  المتظاهرين  بالتقوى  "القديسيين"  المذكورين  في  المكابيين  (1  مك  2:  42  و7:  3  و2  مك  14:  6)،  والذين  اشتركوا  في  الثورة  المكابية  ضد  انطيوخوس  ابيفانس  (175ـ  163  ق.م.).  وقد  ظهر  الفريسيون  باسمهم  الخاص  في  عهد  يوحنا  هركانوس  (135ـ  105  ق.م.)،  وكان  من  تلامذتهم  فتركهم  والتحق  بالصدوقيين.  وسعى  ابنه  اسكندر  ينايوس  من  بعده  إلى  إبادتهم  غير  أن  زوجته  الكساندرة  التي  خلفته  على  العرش  سنة  78  ق.م.  رعتهم  فقوي  نفوذهم  على  حياة  اليهود  الدينية  وأصبحوا  قادتهم  في  الأمور  الدينية.
أما  من  حيث  العقيدة  فكانوا  يقولون  بالقدر  ويجمعون  بينه  وبين  إرادة  الإنسان  الحرّة.  وكانوا  يؤمنون  بخلود  النفس  وقيامة  الجسد  ووجود  الأرواح  (أع  23:  8)  ومكافأة  الإنسان  ومعاقبته  في  الآخرة  بحسب  صلاح  حياته  الأرضية  أو  فسادها  غير  أنهم  حصروا  الصلاح  في  طاعة  الناموس  فجاءت  ديانتهم  ظاهرية  وليست  قلبية  داخلية.  وقالوا  بوجود  تقليد  سماعي  عن  موسى  تناقله  الخلف  عن  السلف.  وزعموا  أنه  معادل  لشريعته  المكتوبة  سلطة  أو  أهمّ  منها.  فجاء  تصريح  المسيح  بأن  الإنسان  ليس  ملزمًا  بهذا  التقليد  (مت  15:  2  و3  و6).
كان  الفريسيون  في  أول  عهدهم  من  أنبل  الناس  خلقًا  وأنقاهم  دينًا،  وقد  لاقوا  أشدّ  الاضطهاد،  غير  أنه  على  مرّ  الزمن  دخل  حزبهم  من  كانت  أخلاقهم  دون  ذلك،  ففسد  جهازهم  واشتهر  معظمهم  بالرياء  والعجب.  فتعرضوا  عن  استحقاق  للانتقاد  اللاذع  والتوبيخ  القاس).  فيوحنا  المعمدان  دعاهم  والصدوقيين  "أولاد  الأفاعي"  كما  وبخهم  السيد  المسيح  بشدة  على  ريائهم  وادعائهم  البرّ  كذبًا  وتحميلهم  الناس  أثقال  العرضيات  دون  الاكتراث  لجوهر  الناموس  (مت  5:  20  و16:  6  و11  و12  و23:  1ـ  39).  وكان  لهم  يد  بارزة  في  المؤامرة  على  حياة  المسيح  (مر  3:  6  ويو  11:  47ـ  57).  ومع  هذا  فكان  في  صفوفهم  دومًا  أفراد  مخلصون  أخلاقهم  سامية،  منهم  بولس  في  حياته  الأولى  (أع  23:  6  و26:  5ـ  7  وفي  3:  5)  ومعلمه  غمالائيل  (أع  5:  34).

كان  ما  سبق  هم  الفريسيين  ولاحظ  عزيزي  القارئ  أن  من  صفاتهم  "ضيق  التعليم"  إلا  أن  صديقنا  لم  يجد  غضاضة  من  أن  يجعلها  "غزير  التعليم"  من  خلال  وصفه  "  برجل  المعلومات  الأول"
والحقيقة  إننا  اشكر  صديقنا  على  هذا  التغيير  فمع  حيرته  مع  ما  نقدمه  من  ماده  علميه  وعدم  استطاعته  ان  يرد  العلم  بالعلم  لم  يجد  أمامه  إلا  أن  يصفنا  في  وسط  المسبة  التي  حاولها  ب  "  رجل  العلم  الأول"  ..  ونقول  له  ..  شكرا.

ودعونا  نتعلم  من  صديقنا  فنتأمل  نحن  أيضا  في  أفعال  الفريسيين  .  وقتها  سنجد  أننا  أمام  فئة  "  قليله  العلم"  لا  تتخذ  رد  فعل  ولكنها  دائما  تنتقد  ردود  الأفعال.  فلنتذكر  معا  مسيره  المسيح  مع  تلاميذه  وجوع  التلاميذ  مما  دفعهم  إلي  قطف  الثمار  (مر  2)  فلم  يجد  الفريسيين  إلا  أن  ينتقدوا  هذا  التصرف  ..  لم  يتحرك  الفريسيين  خطوة  واحدة  تجاه  موقف  ،  ولم  يتخذوا  موقفا  تجاه  الحدث  (جوع  التلاميذ)  ولكنهم  انتقدوا  التصرف  فقالوا  مر  2  :  24    "فقال  له  الفريسيون:  انظر  لماذا  يفعلون  في  السبت  ما  لا  يحل  "
وهكذا  أيضا  قال  اليهود  عند  شفاء  المسيح  يوم  السبت  يو  5  :  10  "فقال  اليهود  للذي  شُفي  إنه  سبت.  لا  يحل  لك  أن  تحمل  سريرك"
هكذا  ومن  منطلق  التأمل  نجد  أن  الفريسي  "  لا  يفعل  شيئا"  ولكنه  فقط  "  يهاجم  الأفعال"  ..  لذا  وعلى  سبيل  السؤال  والاستفسار  فقط  نتساءل  لمن  اتهمنا  إننا  فريسيين  ..  أين  مواقفكم  انتم  بخلاف  انتقادكم  لمواقفنا.

لن  أطيل  في  هذه  النقطة  أكثر  من  هذا  (ربما  مؤقتا)  ولكني  أثق  عزيزي  القارئ  انك  أدركت  الان  من  هو  الفريسي    الذي  لا  ريب  فيه.

2-  السياسة  والكنيسة.
تشرف  رابطة  حماة  الإيمان  إنها  ذات  مواقف  ثابتة  تجاه  التملق  السياسي  الذي  يأتي  من  بعض  ممن  لا  يراعون  زيهم  الكهنوتي  .  بداية  من  التصريحات  العنترية  التي  تصدر  من  البعض  حتى  الموقف  الشهير  الخاص  بغناء  احد  المطربين  أمام  الهيكل.
وفي  وسط  دفاعنا  عن  قدسية  الزى  الكهنوتي  والأماكن  المقدسة  كان  لصديقنا  أن  يرسل  إلينا  صورة  لنيافة  الحبر  الجليل  الأنبا  بيشوي  مع  بعض  الضيوف  أمام  المذبح  في  احد  الكنائس  فيقول  واصفا  الصورة  :
"  والمشهد  هنا  بكنيسة  الأنبا  أنطونيوس  بالمحلة  الكبرى،  وفيه  الأنبا  بيشوي  يدخل  أشر  قيادات  الإخوان  مثل  سعد  الحسيني  أمام  هيكل  الرب  وفي  قلب  بيت  الصلاة"

ويطلب  منا  أن  نرد  ببيان  على  هذا  التصرف  !!
لاحظ  عزيزي  القارئ  بداية  أن  الأخوان  سقط  حكمهم  من  عام  يزيد  او  يقل    تقريبا  يسبق  واقعه  الغناء  .  لذا  كان  لابد  أن  أواجهه  بنفسه  لأنه  (هو)  الذي  يرى  ان  هذا  التصرف  خاطئا  !!  فطلبنا  منه  ان  يتفضل  ويصيغ  البيان  !!
وللأسف  لم  يحدث!

ونأتي  إلي  نصف  الحقيقة  الآخر  التي  أخفاها  وهو  شيء  هام  جدا  ..  أن  السيد  "  سعد  الحسيني"  لم  يكون  مدعوا  بصفته  "  اخوانيا"  بل  كان  مدعوا  بصفته  "  المحافظ"  ..  بغض  النظر  هل  هو  أخوان  مسلمين  أم  لا  ولكنه  كان  المحافظ  لذا  من  الطبيعي  أن  نقرأ  مثل  هذه  الأخبار
"قدم  المهندس  سعد  الحسينى  محافظ  كفر  الشيخ  التهنئة  للإخوة  المسيحيين  بمناسبة  الاحتفال  بعيد  القيامة  المجيد  بكنيسة  مارى  جرجس  بكفر  الشيخ  ."  –  وكاله  انباء  ONA  5  مايو  2013
"قدم  المهندس  سعد  الحسينى  محافظ  كفر  الشيخ  والقيادات  التنفيذية  والشعبية  التهنئة  للإخوة  الأقباط  بمناسبة  عيد  القيامة  المجيد  وذلك  بكنيسة  مارى  جرجس  بكفر  الشيخ.
كان  في  استقبال  المحافظ  والقيادات  نيافة  الأنبا  بيشوي  مطران  دمياط  وكفر  الشيخ  ودير  القديسة  دميانة  والقمص  بطرس  بطرس  بسطورس  وكيل  المطرانية. 
وأكد  المحافظ  على  الوحدة  الوطنية  بين  المسلمين  والمسيحيين  مشيرا  إلى  أن  الإسلام  والمسيحية  يدعوان  للحب  والتراحم  والإخوة.  "  شبكه  الإعلام  العربية  5/2013
والكثير  من  المواقف  التي  توجه  اليها  (المحافظ)  الي  الكنيسة  .
ودعونا  نضع  ملخص  الزيارة  إخباريا  ليكون  الحكم  عادلا  للقارئ
https://www.youtube.com/watch?v=Ozqnv4vV0fQ&index=13&list=UUbF63SParIeQH_BFre0uJLg
وعجبا  للبعض  الذين  ثاروا  وماجو  عندما  تجاهلت  قيادات  الدولة  في  زمن  الأقباط  الكنائس  والمناسبات  الدينية  المسيحية  ..  وأيضا  يثورون  أن  توجهوا  للكنيسة  !!
اعتقد  أن  ما  حدث  شيئا  عاديا  جدا  وأعتقد  أن  صديقنا  أيضا  يعترف  بهذا  في  داخل  نفسه
ملاحظة:  أعتقد  أن  ما  ينادي  به  صديقنا  ويعظنا  ليلا  نهارا  يتنافى  مع  التطاول  على  اسم  أستاذي  "  جون  تكلا"  فوصفه  باسم  "  حاجة  تكلا"  ..  فلا  أعتقد  أن  السيد  المسيح  الذي  وجه  نقده  الفريسيين  كان  سيرضى  بهذا  التطاول  ..


3-  قداسة  البابا  المعظم  نيافة  الأنبا  رافائيل
كثيرا  ما  تترجم  الكراهية  والحقد  تلقائيا  والتى  قاومها  السيد  المسيح  بشدة  الي  تصرفات  طائشة  غالبا  ما  تخجل  قائلها  ويصعب  التراجع  عنها  نهائيا  ..  وقد  اكتشف  صديقنا  الخطأ  الفادح  الذي  قام  به  عندما  اتهمنا  زورا  "  بأننا  نطلب  من  البابا  الاعتذار"  وعاد  صديقنا  ليصلح  الموضوع  ويهدم  مقاله  لتتغير  صيغته  ومحور  الهجوم  علينا  تماما.
واترك  من  قرأ  المقال  قبل  التعديل  يقرأه  بعد  التعديل  .  وأتمنى  من  كل  قلبي  ان  ينكر  صديقنا  انه  قام  بهذا  التعديل  في  مقاله  ..  صدقوني  أتمناها  وبصدق  .. 
ويكفيني  انه  اعترف  أن  هناك  لبس  في  ما  قاله  قداسه  البابا  عندما  قال  صديقنا  :
"ربما  ما  قاله  الأنبا  تواضروس  يحتاج  لتوضيح  في  هدوء،  واضح  أن  ما  يقصده  هو  بعض  الأمور  التي  جعلناها  خلاف  بينما  هي  تنوع  مثل  الترانيم،  ربما  لا  يقصد  أمور  جوهرية،  وإن  كان  حتى  تلك  الأمور  ينبغي  ان  تناقش  في  هدوء  وانفتاح  ووعي  لأجل  الوصول  للوحدة،  والمتعصب  والفريسي  هو  أخر  شخص  يفعل  ذلك،  في  رأيي  الشخصي  أن  وحدة  الكنيسة  لن  تأتي  من  المقدمة،  فالمقدمة  في  كل  الطوائف  مقيدة  بأمور  كثيرة  تمنعها  عن  أن  تكون  كما  يشتهي  المسيح،  وإن  لن  تتخلص  منها،  لن  تأتي  منها  وحدة  ولن  يستعلن  المسيح  كما  يشتهي  من  الأمام."
هكذا  قام  صديقنا  بإعادة  ترجمه  ما  صرح  به  قداسه  البابا  المعظم  .  ولنناقش  معا  ما  قاله  صديقنا
ذكر  صديقنا  كلمه  ربما  مرتين  ..  هو  غير  متأكد
استخدم  صديقنا  يحتاج  إلي  توضيح  ...  فهو  يرى  غموض  كلام  قداسة  البابا
استخدم  (إن)  الظنية  مرتين  ..  من  حق  كل  إنسان  أن  يظن  ويتظن  ..
فاجأنا  برأيه  الشخصي  ..  فهل  يرى  أيضا  ان  من  حقه  إسقاط  رأيه  الشخصي  على  قداسه  البابا  !!!!
عموما  قداسة  البابا  أنهى  الجدل  نسبيا  عندما  أعلن  أن  الانحراف  عن  الأرثوذكسية  هو  خيانة  ...  وأعلن  ان  للطوائف  بدع  ..  .  ويتم  التحفظ  على  ما  قاله  صديقنا  ورأيه  فعند  التعليم  رأي  الكنيسة  هو  الأعم  والأشمل  والسائد  على  الجميع..    ومن  فم  قداسه  البابا  شخصيا  ..
أما  عن  نيافة  الأنبا  رافائيل  والذي  عرف  عنه  أرثوذكسيته  ..  فاكرر  أسئلتي  التي  ذكرتها  سابقا  وألمت  صديقنا  لدرجه  الصراخ.

4-  متى  المسكين  والتدليس  عن  الكتاب  المقدس
كانت  صدمه  رهيبة  بالنسبة  للبعض  اكتشاف  أن  الأب  متى  المسكين  قد  بالغ  وتغالي  في  رأيه  على  الكتاب  المقدس  في  موضوع  تطهير  المرأة  وقطعا  نصوص  أخرى  كتابية  كثيرة  جدا  وصمم  إن  هناك  تلامس  حادث  بين  الاثنين  .  سنتحدث  علميا  عن  هذا  الموضوع  لاحقا  في  مقال  أخر  الا  ان  ازمه  كلمة  "  تلامس  مع  المرأة"  و  "  لمس  المرأة"  تم  افتعالها  للخروج  من  إطار  الأب  متى  المسكين  وما  قاله  على  الكتاب  بما  ليس  فيه  ليحولوها  الي  هجوم  على  شخصي  الضعيف  ..
لذا  كان  من  الطبيعي  أن  يتم  اقتصاص  جزء  من  المقال  ليحولوها  إلي  شخصنه  ..
ولكن  فات  هؤلاء  اني  نوهت  في  الحوار  على  إنني  عدلت  البوست  واضعا  صورة  الاقتباس  المنسوب  للمسكين  وناقلا  الكلمة  حتى  لا  يعترض  الأغبياء  ..
وسنعود  قريبا  جدا  لهذا  الأمر  ..  لن  أطيل  عليك  عزيزي  القارئ  أكثر  من  هذا  واشكر  محبتك  انك  وصلت  معي  الي  هذه  النقطة  من  المقال.
وسيكون  لنا  عوده  خارج  الصراعات  الخاصة  والشخصنه  لتظل  المادة  العلمية  حكما  قويا  سيفا  بتارا  على  الأصوات  الجوفاء  ..
ولنا  لقاءات  أخرى
مينا  اسعد  كامل
وبكل  فخر 
المتحدث  الرسمي  لرابطة  حماة  الإيمان  الأرثوذكسية
أبناء  أعمده  الكنيسة  العظام







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[1]  مقدمه  في  علم  المنطق  –  المغالطات  المنطقيه  –  بحث  شهير

[2]  محاورة  جورجياس  لأفلاطون  –  ترجمة  محمد  حسن  ظاظا  –  مراجعه  د.  علي  سامي  النشار  –  الهيئة  المصرية  العامة  للتأليف  والنشر  1970

[3]  عادل  مصطفى  –  المغالطات  المنطقية  خبزنا  اليومي  –  المجلس  الأعلى  للثقافة  -  2007

[4]  وهي  الاستدلال  بشيء  محل  الخلاف  في  بطن  السؤال  أو  كما  يصفها  ابن  سينا  "المصادرة  على  المطلوب  إثباته،  معناها  أن  المغالط  يستخدم  مقدمة  تحوي  ضمنياً  المطلوب  إثباته  ثم  منها  يستنتج  ما  يريد  أن  يثبته،  فهي  على  هذا  نوع  من  أنواع  الاستدلال  الدائري

[5]  دائرة  المعارف  الكتابيه


بقلم  الاستاذ مينا اسعد 

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